स्वच्छता की अलख जगाने गांवों में उतरे गढ़वाल विश्वविद्यालय के विद्यार्थी,कचरा प्रबंधन और स्ट्रीट लाइट की समस्याएं आई सामने
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गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। स्वच्छता केवल सड़कों और गांवों को साफ रखने तक सीमित नहीं,बल्कि यह स्वस्थ समाज,सुरक्षित पर्यावरण और जिम्मेदार नागरिकता की बुनियाद है। इसी सोच को धरातल पर उतारने के उद्देश्य से हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचकर स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाई। इस दौरान विद्यार्थियों ने ग्रामीणों से सीधा संवाद कर प्लास्टिक प्रदूषण के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक किया। वहीं गांवों में कचरा प्रबंधन की बदहाल व्यवस्था और पथ प्रकाश की समस्याएं भी सामने आईं। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश सिंह के संरक्षण एवं दिशा-निर्देश में स्वच्छता ही सेवा-2026 अभियान के अंतर्गत स्वच्छता के लिए जनभागीदारी कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी विकसित करना,एकल उपयोग वाली प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करना तथा पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली को बढ़ावा देना रहा। कार्यक्रम के समन्वयक प्रो.बी.पी.चमोला और सह-समन्वयक प्रो.विजय कांत पुरोहित के निर्देशन में कार्यक्रम के सदस्य डॉ.आलोक सागर गौतम तथा वानिकी विभाग के मान्या कठैत और सूर्यांश सहित 30 से अधिक विद्यार्थियों ने अभियान में सक्रिय भागीदारी की। विद्यार्थियों ने डुंगरीपंथ,चमधार,कलियासौड़,मां धारी देवी मंदिर परिसर और आसपास के गांवों का भ्रमण कर ग्रामीणों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया। जनजागरूकता अभियान के दौरान विद्यार्थियों ने ग्रामीणों को एकल उपयोग वाली प्लास्टिक से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक का अनावश्यक उपयोग न केवल प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है,बल्कि इसके अनुचित निस्तारण से भूमि और जल प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती है। विद्यार्थियों ने लोगों से बाजार जाते समय प्लास्टिक की थैलियों के स्थान पर कपड़े के थैले अपनाने तथा एक बार इस्तेमाल होने वाले कप,प्लेट और चम्मच के बजाय बार-बार उपयोग किए जा सकने वाले विकल्पों को प्राथमिकता देने की अपील की। उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी आदतों में बदलाव लाकर भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा योगदान दिया जा सकता है। अभियान के दौरान स्वच्छ पर्व और उत्तराखंड की पारंपरिक हरित पहल हरेला के महत्व पर भी चर्चा की गई। विद्यार्थियों ने ग्रामीणों को त्योहारों,धार्मिक आयोजनों और सामुदायिक कार्यक्रमों के दौरान स्वच्छता बनाए रखने तथा कचरे का उचित निस्तारण सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया। हरेला पर्व के संदर्भ में पौधारोपण,प्रकृति संरक्षण और जैव विविधता को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। विद्यार्थियों ने कहा कि उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराएं हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीने की प्रेरणा देती हैं। इन परंपराओं को व्यवहार में अपनाकर पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दिया जा सकता है। अभियान के दौरान ग्रामीणों से बातचीत में कचरा प्रबंधन की गंभीर समस्या सामने आई। ग्रामीणों ने बताया कि नियमित रूप से कूड़ा एकत्र करने के लिए वाहन उपलब्ध नहीं होने और कचरे के उचित निस्तारण की व्यवस्था के अभाव में उन्हें कई बार कचरा जलाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कचरा जलाने से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण बढ़ा सकता है और लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। ऐसे में केवल लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना ही पर्याप्त नहीं है,बल्कि गांवों में नियमित कचरा संग्रहण,वैज्ञानिक तरीके से अपशिष्ट निस्तारण और आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी जरूरी है। ग्रामीणों की ओर से सामने आई यह समस्या स्थानीय निकायों और संबंधित विभागों के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि गांवों में कचरा एकत्र करने की नियमित व्यवस्था विकसित की जाए और लोगों को कचरे को अलग-अलग रखने तथा उचित स्थान पर जमा करने के लिए प्रेरित किया जाए,तो खुले में कचरा फेंकने और उसे जलाने जैसी समस्याओं पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। ग्रामीणों ने क्षेत्र में पथ प्रकाश की समस्या से भी विद्यार्थियों को अवगत कराया। गांवों में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था न होने से विशेषकर शाम और रात के समय आवागमन में परेशानी हो सकती है। ग्रामीणों की ओर से उठाए गए इन मुद्दों ने स्पष्ट किया कि स्वच्छता के साथ-साथ गांवों में बुनियादी सुविधाओं का सुदृढ़ होना भी आवश्यक है। विद्यार्थियों के इस भ्रमण ने स्थानीय समस्याओं को समझने और ग्रामीणों की आवश्यकताओं को करीब से जानने का अवसर प्रदान किया। हालांकि,इन समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए संबंधित विभागों और स्थानीय प्रशासन के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता होगी। गढ़वाल विश्वविद्यालय की इस पहल ने स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति विद्यार्थियों तथा ग्रामीणों के बीच सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश दिया। अभियान ने यह भी रेखांकित किया कि स्वच्छता का लक्ष्य केवल जागरूकता कार्यक्रमों से पूरा नहीं हो सकता,बल्कि इसके लिए जनसहयोग,नियमित कचरा संग्रहण,उचित निस्तारण और स्थानीय स्तर पर आवश्यक सुविधाओं का होना भी जरूरी है। विद्यार्थियों की यह पहल ग्रामीण समाज को स्वच्छता के प्रति जागरूक बनाने के साथ ही गांवों की वास्तविक समस्याओं को सामने लाने का माध्यम बनी। जरूरत इस बात की है कि जागरूकता के इन प्रयासों को नियमित गतिविधियों से जोड़ा जाए और ग्रामीणों की ओर से उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए संबंधित विभाग प्रभावी कदम उठाएं। संदेश स्पष्ट है-स्वच्छ गांव,स्वस्थ समाज और सुरक्षित पर्यावरण का सपना तभी साकार होगा,जब जनभागीदारी के साथ व्यवस्था की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित की जाएगी।
