मधुबनी चित्रकला की अनन्य चित्रकार हैं ललिता पाठक - डॉ. सम्राट सुधा
सचिन शर्मा
रुड़की। डॉ. सम्राट् सुधा ने कहा है कि ललिता पाठक मधुबनी चित्रकला की सिद्धहस्त चित्रकार हैं।वे अनवरत चित्र बनाती ; मानो गगन से उतरती चित्र कविताओं के रेखाचित्र उकेरती ,उनमें रंग भरती ; रेखाओं तथा रंगों से चित्र में भावों को उपस्थित करतीं हैं।
मधुबनी चित्रकला को मिथिला चित्रकला भी कहते हैं, बिहार के मिथिला क्षेत्र की यह एक प्रमुख कला परंपरा है। प्रायः यह चित्रकला महिलाओं के द्वारा बनायी जाती है और इसमें प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। मधुबनी पेंटिंग, जिसे मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है, मूल रूप से बिहार के मिथिला क्षेत्र में यह चित्रकला पहले मिट्टी की दीवारों और फर्श पर बनायी जाती थी, लेकिन अब इसे क़ाग़ज़, कपड़े और कैनवास पर भी बनाया जाने लगा है।
ललिता पाठक प्रायः कपड़े, साड़ियों, बैग्स तथा दैनिक प्रयोग की वस्तुओं पर भी अपनी कला सजाती हैं। इतना ज्ञात हुआ कि वे संघर्ष से व्युत्पन्न अनुपम चित्रकार हैं और रंगों को भरती हुई वे अन्य से बहुत उच्च तथा अलौकिक प्रतीत होती हैं। उन्होंने बचपन ऐसे परिवेश में व्यतीत किया है, जिसमें लड़कियों के बाहर निकलने पर सामाजिक बंधन हुआ करता था। अब वे जिला मधुबनी , बिहार में ही एक शिक्षिका हैं ।
प्रायः मैं उन्हें 'ईश पुत्री' लिखता हूँ , अपनी अद्भुत कला से , वे इससे भिन्न भला हो भी क्या सकती हैं ! बातचीत में एक कलाकार को जितना शिष्ट तथा सौम्य होना चाहिए, वे इसका साक्षात् उदाहरण हैं ! कलाकार अनुशासित और शिशुवत ना हो , तो उसकी कला में सत्यता और संवेदनशीलता आ ही नहीं सकती, यह मेरा वैयक्तिक मत है ! ललिता पाठक ऐसी एक निश्छल साधिका हैं, यह मेरा विश्वास है !
दूरभाष पर साक्षात्कार में ललिता पाठक ने कहा कि "मधुबनी चित्रकला को उसके मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखते हुए मैं विभिन्न अभिव्यक्ति माध्यमों से इसे उपस्थिति करती रहूँ , यही मेरा प्रयास है !"
यह एक सामान्य लेखक के नाते मैं अपना धर्म समझता हूँ कि धरती के वस्तुतः सीधे ईश-संबद्ध विशिष्टजनों के संदर्भ में कुछ लिख सकूँ।